#चामुखा_महादेव_मंदिर_ऊना_सोलह_सिंगी_धार_ऊना ऐतिहासिक, धार्मिक और पर्यटन स्थल।
ऊना। शशिपाल शर्मा।
पुरातत्व विभाग शिमला के विशेषज्ञों के अनुसार यह मंदिर 5500 साल से भी ज्यादा पुराना है। मान्यता है कि मंदिर में स्थित चारमुखी शिवलिंग पांडव काल या उससे पहले से ही इसी जगह पर है। पांडव काल ने बनवास के दौरान इस शिवलिंग की पूजा-अर्चना की थी।मान्यता है कि पांडवों द्वारा एक ही शिला से इस शिवलिंग का निर्माण किया गया था।शिवलिंग के सामने ही बड़ी सी नंदी की मूर्ति विराजमान है । जो आज भी चौमुखा गांव में मौजूद है और जो श्रद्धालुओं की श्रद्धा व आस्था का प्रतीक है। माना जाता है कि अज्ञावास के दौरान पांडवों, विश्वकर्मा व श्री कृष्ण जी की देख रेख में इस मंदिर का निर्माण किया गया था। यह मंदिर सोलाहसिंगी धार पर स्थित है। चामुखा महादेव मंदिर के गर्भ गृह में भगवान भोलेनाथ चारमुखी शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। जिसमें से तीन मुख बंद हैं और एक मुख पूर्व दिशा की ओर खुला हुआ है। जिला हमीरपुर और ऊना की सीमाओं पर अवस्थित सोलहसिंगी धार और पिपलु धार के बीच पनतेहड़ी गांव में पिपलु-बड़सर मार्ग पर पिपलु से 3 किलोमीटर दूर स्थित पांडवकालीन चामुखा महादेव।
मान्यता के अनुसार, चामुखा महादेव मंदिर में स्थित शिवलिंग के पास और मंदिर के कपाटों के दोनों ओर शिवगण विराजमान है। इस मंदिर में आकर उनकी पूजा-अर्चना करने से “गण्डमूल” में जन्में किसी भी व्यक्ति के सारे ग्रह शांत होते हैं। इतना ही नहीं गण्डमूल के प्रकोप से भी छुटकारा मिलता है। मान्यता है कि मंदिर के दरवाजे सोने की धातु से बनाये गए थे। कुछ समय पश्चात लुटेरों ने इन दरवाजों को चुरा लिया, लेकिन लुटेरे जब इन दरवाजों को चुराकर ले जा रहे थे, तो अचानक इन दरवाजों का वजन अत्याधिक बढ़ गया। जिसे वे उठाने में असमर्थ रहे तो उन्होंने इन दरवाजों को साथ लगते हमीरपुर जिले के राजनौंण में फेंक दिया। थोड़ी देर बाद दरवाजे पत्थर में तबदील हो गए। इस राजनौंण का निर्माण भी पांडवों द्वारा ही किया गया था। जो आज भी यहां पर मौजूद है। जो लोगों की श्रद्धा व आस्था का प्रतीक है। इस मंदिर के प्रांगण में एक बहुत लंबी गुफा का भी निर्माण किया गया था। जिसका उपयोग लोगों द्वारा पहले आने जाने के लिए किया जाता था, लेकिन समय में परिवर्तन होने के साथ साथ ही इस गुफा को बंद कर दिया गया, लेकिन मौजूदा समय में केवल गुफा का थोड़ा सा हिस्सा ही दिखाई देता है। चामुखा महादेव मंदिर के साथ कई जनश्रुतियां और मान्यताएं जुड़ी हैं।
पूरी दुनिया में ऐसे सिर्फ तीन पुरातन शिव मंदिर हैं। जहां पर भगवान शिव चार मुख वाले शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। इन तीनों मंदिरों में सर्वोपरि-
नेपाल के काठमांडू स्थित पशुपति नाथ मंदिर।
हिमाचल प्रदेश के अंब से नादौन के मुख्य मार्ग पर ब्यास नदी के मुहाने और जिला कांगड़ा और हमीरपुर की सीमाओं पर कौलापुर गांव में स्थित पांडवकालीन तंत्र-मंत्र का प्रमुख केंद्र चामुक्खा।
जिला हमीरपुर और ऊना की सीमाओं पर अवस्थित सोलहसिंगी धार और पिपलु धार के बीच पनतेहड़ी गांव में पिपलु-बड़सर मार्ग पर पिपलु से 3 किलोमीटर दूर स्थित पांडवकालीन चामुखा महादेव। बड़सर से इसकी दूरी 19 किलोमीटर है।
चारमुखी शिवलिंग की विशेषता है कि इसके चारों और चार-चार लिंग हैं। जिनमें प्रमुख हैं-
*तलमेहडा स्थित घुनसर महादेव
*राजनौण स्थित वनखण्डेश्वर महादेव
*सुकनौण महादेव
कोट सिहाणा भ्याम्बि
*बछरेटू महादेव।
दक्षिण पश्चिम की ओर चामुखा महादेव मन्दिर के मुख्य द्वार के ठीक दायें व बायें चांद और सूरज तो बिल्कुल मध्य मंगलमूर्ति गणेश अन्य तीन में से दो दरवाजों पर भगवान गणेश और पूर्व दिशा की और देवी की प्रतिमा अवस्थित है।चामुखा महादेव मंदिर के गर्भ गृह में भगवान भोलेनाथ चार मुखी शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं, जिनमें से तीन मुख तो बन्द हैं, किन्तु पूर्व दिशा की ओर वाला मुख खुला हुआ है।यहां रास्ते पर ककड़ सिंगी का भी बहुत पुराना पेड़ चामुखा महादेव मन्दिर के पास ही है। मान्यता के अनुसार यह पेड़ भी मन्दिर जितना ही पुराना है। यहां पहुंचने बाद भगवान की शक्ति और दिव्यता दोनों का अहसास होता है।
स्थानीय लोगों में इस मंदिर की बहुत गहरी आस्था है। सावन माह में यहां दूर दूर से श्रद्धालु आते हैं और शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं और अपनी मन की मन्नतें पूरी करते हैं। सावन माह में ही जंगम द्वारा पूरी रात जागरण भी किया जाता है और फिर भंडारे का आयोजन होता है।यहां से ऊना जिले में मौजूद गोविंद सागर झील का सुंदर नजारा देखने को मिलता है। वहीं, इस मंदिर के प्रांगण में बरगद का काफी पुराना पेड़ अभी भी मौजूद है। पुरातत्व विभाग द्वारा इस मंदिर का सौंदर्यकरण और जीर्णोद्धार कार्य किया जा रहा है। मंदिर परिसर में बेंच लगाए गए हैं, शेड बनाया गया है, वाटर कूलर भी लगाया गया है और पॉम ट्री लगाए गए हैं। मंदिर के साथ ही स्टील से निर्मित एक ऊंची त्रिशूल भी स्थापित की गई है। चौमुखा क्षेत्र दूध और उसके उत्पादों के लिए भी प्रसिद्ध है। यह मंदिर ऐतिहासिक धार्मिक और पर्यटन के रूप में उभर रहा है।
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