*’संपादकीय’*
*’कालाअंब: उद्योगों का हब, सुविधाओं का अकाल’*
*’अब सिर्फ आश्वासन नहीं, एक्शन चाहिए’*
हिमाचल प्रदेश का *’कालाअंब’* प्रदेश की औद्योगिक रीढ़ है। यहां सैकड़ों इकाइयां चलती हैं, हजारों लोगों को रोजगार मिलता है और करोड़ों का राजस्व सरकार को जाता है। लेकिन विडंबना देखिए, जिस क्षेत्र से प्रदेश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है, वही आज बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है।
CII की दिल्ली बैठक में *’लघु उद्योग भारती कालाअंब इकाई के अध्यक्ष अखिल महेश्वरी’* ने जो 3 मुद्दे उठाए हैं, वो नए नहीं हैं। ये सालों से उद्योगपतियों के गले की हड्डी बने हुए हैं।
*’पहला: आग से सुरक्षा नहीं, खिलवाड़ है’*
हाल में कालाअंब में भीषण अग्निकांड हुआ। फायर स्टेशन है, पर आधुनिक उपकरण नहीं। नतीजा? आग बुझाने के लिए यमुनानगर-अंबाला से टेंडर बुलाने पड़े। जब तक वो पहुंचे, करोड़ों का नुकसान हो चुका था। क्या हम उद्योगों को इसी भरोसे पर चलने देंगे कि “हो गया तो देख लेंगे”?
*’दूसरा: सड़क नहीं, कीचड़ का तालाब है’*
कालाअंब-त्रिलोकपुर मार्ग प्रदेश का लाइफलाइन है। बरसात आते ही ये सड़क तालाब बन जाती है। कच्चा माल फंसता है, मजदूर लेट होते हैं, प्रोडक्शन ठप होता है। उद्योग चलाने वाले टैक्स तो समय पर दें, पर उन्हें चलने लायक सड़क तक न मिले – ये कहां का न्याय है?
*’तीसरा: 21वीं सदी में भी रेल से वंचित’*
गुजरात, महाराष्ट्र के औद्योगिक क्षेत्र रेल से जुड़े हैं। कालाअंब आज भी सड़क पर ही निर्भर है। रेल कनेक्टिविटी आ जाए तो ट्रांसपोर्ट की लागत 30-40% तक घट सकती है। नए निवेश आएंगे, एक्सपोर्ट बढ़ेगा। पर इच्छाशक्ति कहां है?
*’अखिल महेश्वरी’* ने सही कहा – उद्योगों को चलाने के लिए सिर्फ बिजली-पानी नहीं, सुरक्षा, सड़क और कनेक्टिविटी चाहिए। बैठक में “आश्वासन” मिल गया, ये अच्छी बात है। लेकिन कालाअंब को अब आश्वासनों से नहीं, *’प्रोजेक्ट और बजट’* से मतलब है।
सरकार, सांसद और CII से अपेक्षा है कि इस बार फाइलें धूल न खाएं। कालाअंब को मजबूत करेंगे तो हिमाचल की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। नहीं तो एक दिन उद्योग पलायन करेंगे और हम सिर्फ रैलियां करते रह जाएंगे।
*’कालाअंब को अब अनदेखा करना, प्रदेश के भविष्य से खिलवाड़ है।’*
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